Published On: Fri, Sep 26th, 2014

मातृशक्ति का पर्व है ‘नवरात्र’

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नई दिल्ली। नवरात्र का पावन पर्व आद्यशक्ति माँ भगवती का पर्व है। माँ दुर्गा ने महिषासुर का वधकर अधर्म का नाश करके धर्म की संस्थापना कर सद्शक्तियों का संरक्षण और संगठन किया था। मातृशक्ति की इस दिव्यलीला का आध्यात्मिक उत्सव होता है ‘नवरात्र’।

RH-Navrataraनवरात्र का पर्व वास्तव में मातृशक्ति की साधना का पर्व है, नवजागरण का पर्व है। मातृशक्ति का भारतीय संस्कृति में सर्वोच्च महत्व है। जीवन का प्रवाह, हमारी प्राणशक्ति का स्नोत मातृशक्ति ही है। ब्रह्मांड के हर तत्व में निहित व हर तत्व की सृजनकर्ता मातृशक्ति ही है। इसलिए हिंदू धर्म के अनुसार मातृशक्ति को सच्चिदानंदमय ब्रह्मस्वरूप भी कहा गया है। इसके बिना किसी भी ईश्वरीय तत्व का उद्भव ही संभव नहीं है। मातृशक्ति को आद्यशक्ति भी कहा गया है। मां भगवती के नवस्वरूप की अर्चना साधना का पर्व है ‘नवरात्र’। मां भगवती का हर स्वरूप अध्यात्म के मूल तत्वों- ज्ञान, सेवा, पराक्रम, समृद्धि, परमानंद, त्याग, ध्यान और सृजन शक्ति का अवतरण है। मातृशक्ति के चार स्वरूप-गीता, गंगा, गायत्री और गौ माता हैं।

आद्यशक्ति मां भगवती की साधना को जीवन में धारण कर मनुष्य अपनी क्षुद्रताओं से परे जाकर अपने इष्ट के देवत्व से एकाकार कर सकता है। मनुष्य की कोई भी सोच जो समाज में भेद पैदा करे, मनुष्य को मनुष्य से दूर करे चाहे वह भाषावाद, प्रांतवाद और जातिवाद की ही बात क्यों न हो, उसे पनपने नहीं देना चाहिए। हम सभी आद्यशक्ति मां भगवती की संतान हैं। हम सभी में एक ही चेतना है, एक ही प्राण हैं। हमारे किसी भी भेद से कष्ट मां भगवती को ही होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसने हमें इस पावन धरा पर आपसी प्रेम व भाईचारे का अनुपम संदेश हर जगह फैलाने के लिए भेजा है। यही संगठन साधना है और राष्ट्र साधना है। मनुष्य को सही मायने में मनुष्य बनाने के लिए किया गया सवरेत्तम प्रयास है। नवरात्र में हम एक बार पुन: नव-ऊर्जा से परिपूरित होकर भारतीय जनमानस के लिए कुछ कर सकें तो समाज का कल्याण निश्चित है। मां भगवती का दिव्य संदेश भी यही है।

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