Published On: Tue, Sep 30th, 2014

नकली इतिहास को मिटाकर दिल्ली विश्वविद्यालय लिखेगी भारत का नया इतिहास

[ A+ ] /[ A- ]


नई दिल्ली। भारत के मूल इतिहास को पिछले 67 सालों से चली आ रही काँग्रेस सरकार ने कब्र में दफन कर दिया था। अब केन्द्र में नई सरकार बनने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय ने देश की मूल इतिहास को कब्र से निकालने का बीड़ा उठा लिया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग ने इस प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू भी कर दिया है। आने वाले समय में हमारे देश के लोगों को भारत के गौरवपूर्ण इतिहास से साक्षात्कार हो सकेगा। शोधकर्ताओं ने ऐसी उम्मीद जताई है।

RH- Aryavartगौरतलब है कि आजादी के बाद से ही प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू की सरकार ने सारे मूल पुस्तकों को अँधेरे कोठरी में डालकर तथाकथित शिक्षा विभाग वामपंथियों के हवाले कर दिया था। इन लोगों ने भारतीय इतिहास के तौर पर केवल मध्यम भारत का इतिहास को प्रमुखता से आगे बढ़ाया जिसमें कि सिर्फ मुगलों द्वारा भारत पर आक्रमण की दास्ता लिखी गई है। इन लोगों ने भारत पर जिन आक्रांताओं ने कब्जा किया था, उनके बहादुरी के कलमें पढ़ें और उनके शासन के गुणगान किये। शेष भारतीय सभ्यता और संस्कृति को दूषित कर उन्हें खण्डित करने में कोई कसर नहीं छोड़ा।

उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक जो ज्यादातर आजकल पढ़ाएँ जाते हैं, उसमें लिखा है कि एक वक्त मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी जगहों पर सिंधु घाटी सभ्यता फूल-फल रही थी। आज से करीब 3,500 साल पहले घुमंतू आर्यों के कबीले जब पहाड़ों को पार कर भारत आए और उसके बाद सिंधु घाटी सभ्यता का पतन शुरू हो गया।

हालांकि, यह बात कांग्रेस के वामपंथियों ने यूरोपीय सोच के प्रभाव में आकर लिखी है। शुरू से ही इनका समय-समय पर विरोध होता रहा है। लेकिन सत्ता में काबिज होने के कारण विदेशी सोच वाले अधपढ़े अधिकारियों को राष्ट्रीय सम्मान देकर उनकी बात को पत्थर पर लकीर बताया गया। भारत के मूल इतिहास के जानकारों का सवाल रहा है कि यदि आर्य बाहर से आए, तो भारत का प्राचीन नाम आर्यावर्त क्यों था। भारत की मूल वैदिक सभ्यता रही है।

यह देश वेदों के मार्गदर्शन पर चलता था। ऋषि-मुनि-साधु-संत भारत के संरक्षक हुआ करते थे। उनके ही निर्देशों पर राजव्यवस्था कार्य करती थी। समस्त समाज स्वस्थ और सुन्दर वातावरण में विचरण करता था। ऐसा था भारत का गौरान्वित इतिहास। जिसे आज से 14 सौ वर्ष पूर्व मुस्लिम आक्रमणकर्ताओं ने नष्ट कर अपनी सामाजिक व्यवस्था हम पर थोप दिया।

उसके बाद से निरंतर मुगलों के समर्थक भारत के इतिहास को झूठलाकर जर्मन लेखक मैक्स मूलर द्वारा लिखित पुस्तकों को आधार मानकर ही हमारे शैक्षिक संस्थाओं में पढ़ाते रहे हैं। जबकि मैक्समूलर की योग्यता ही सवालों के घेरे में है। वो मैक्स मूलर जो पश्चिम सभ्यता और गोरे लोग ही सबसे ज्यादा बुद्धिमान होते है की मानसिकता से पीड़ित था, उसने भारतीय ग्रंथों को पढ़ने के बाद पश्चिमी सभ्यता को बड़ा बताने के लिए भारत के गौरवशाली इतिहास को गलत बता दिया और जिसे गलत साबित न कर सका उसे पश्चिमी सभ्यता से लिया हुआ बता दिया।

इन्हीं ऐतिहासिक तथ्यों में सुधार के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग ने पिछले सप्ताह गुजरात के गवर्नर ओ.पी. कोहली और वीसी दिनेश सिंह की मौजूदगी में इस प्रॉजेक्ट की घोषणा की है। मौका था संस्कृत में शोध कार्य शुरू होने के 60 वर्ष पूरे होने का। डीयू के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष रमेश भारद्वाज ने कहा, ‘जहां तक इंडो-आर्यन के मूल स्थान की बात है तो इस बारे में विचारकों के दो खेमे हैं। संस्कृत विभाग ने प्राचीन अभिलेखों और पुस्तकों पर शोध किया है। पुरातात्विक और नए वैज्ञानिक सबूतों के साथ अपने शोध के जरिये हम यह साबित करना चाहते हैं कि भारतीय संस्कृति विदेश से नहीं आई।’ उन्होंने कहा, ‘आर्य भारतीय उप-महाद्वीप में रहते थे और यहीं से दूसरी जगहों पर गए।’

सूत्रों ने बताया कि विभाग ऐतिहासिक सबूत जुटाने के लिए भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् के अध्यक्ष वाई.एस. राव से जल्द संपर्क करेगा। मोदी सरकार आने के बाद प्रो. वी एस राव ने यह पद संभाला है। इससे पहले राव ने जाति प्रथा में उपजे समस्याओं तथा अखण्ड भारत में सामाजिक समस्याओं का मूल कारण मुसलमानों का भारत पर कब्जा करना बताया था।

भारद्वाज ने कहा कि प्राचीन संस्कृत के शब्दों और पश्चिमी देशों की प्राचीन भाषाओं के शब्दों में समानता दिखती है और यह विदेश की संस्कृतियों पर भारत के प्रभाव का एक सबूत है। उन्होंने सिंधु घाटी सभ्यता और इराक में दजला और फरात नदियों के बीच फूली-फली मेसोपोटामिया की सभ्यता के बीच समानता का भी हवाला दिया। भारद्वाज ने कहा, ‘जब इतनी समानताएं हैं तो हम अपने बच्चों को यूरोपीय थ्योरी क्यों पढ़ाएं?’ उन्होंने बताया कि संस्कृत विभाग इस प्रोजेक्ट के लिए जनवरी से वर्कशॉप का आयोजन शुरू करेगा।

Subscribe to Republic Hind News


About the Author

-

Displaying 2 Comments
Have Your Say
  1. khatam kar do akbar, humayun, aurangzeb ke lesson, le ao Baba Narender Modi, Rana Pratap, Laxmi Bai, Din Dyal Upadhyaye, Shyama Prashad Mukharjee aur Baba Ram Dev

  2. INDIA IS THE LAND OF SAINTS. THE LAND OF TRUTH & WISDOM. AGAIN THE WORLD NEEDS THE SAME ROLE OF INDIA TO GUIDE THE ENTIRE HUMANITY REALIZE THE REAL PROSPERITY OF LIFE. INDIA IS THE SOIL WHERE THE SOURCE OF ETERNAL LOVE-PEACE-JOY WERE THE KEY SUBJECTS OF LIFE. INNER GROWTH OF SOUL BY ALL MEANS WAS THE ROUTE OF OUR EDUCATIONAL SYSTEM. HOW TO OVERCOME PAIN-SORROWS-DESIRES(DEATH) WAS THE KEY SUBJECT IN OUR ANCIENT EDUCATIONAL SYSTEM. ALL THE BEST. I HIGHLY APPRECIATE YOUR EFFORTS. WITH YOU ALWAYS TO MAKE YOUR DREAM COMES TRUE. ALL THE BEST.

Leave a comment

XHTML: You can use these html tags: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

Copyright © 2012-18 Republic Hind News Network. All Rights Reserved.