Published On: Wed, Oct 1st, 2014

मंगलयान की सफलता के बाद आईआईटी-डीयू में धड़ल्ले चल रहे हैं शोध

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नई दिल्ली। मंगलयान की सफलता से भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है जिसने पहली बार में ही मंगल ग्रह तक अपनी पहुंच बनाई है। विज्ञान की यह सफलता कई छोटे-बड़े शोध का नतीजा है। इस तरह की बड़ी कामयाबी के लिए कई शोध दिल्ली के विश्वविद्यालयों और आईआईटी संस्थानों में हो रहे हैं।

RH-MOM Mangalyanमंगलयान की अभूतपूर्ण सफलता के बाद आईआईटी और डीयू जैसे संस्थान इंक्यूबेशन व इनोवेशन सेंटर के जरिये शोध को बढ़ावा दे रहे हैं। छात्र चाहें अकादमिक कोर्स के हों या विज्ञान कोर्स के। नई कल्पनाओं पर काम करने के लिए लाखों रुपये तक दिए जा रहे हैं। आईआईटी में जहां कई रोबोटिक्स क्लब के तहत रोजमर्रा का काम आसान करने वाले प्रयोग हो रहे हैं, वहीं डीयू में 200 से अधिक पर्यावरण से लेकर वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं।

विश्वविद्यालय शोध को बढ़ावा देने के लिए प्रत्येक शोध के लिए 10 लाख रुपये तक की राशि दे रहा है। डीन रिसर्च फिजिक्स एंड मैथेमेटिक्स साइंस अजय कुमार का कहना है कि शोध की संख्या में इजाफा हो रहा है। बीते साल 113 परियोजनाएं पेश की गई थीं, इस साल 255 परियोजाएं छात्रों को दी गई हैं।

वहीं, अंबेडकर विश्वविद्यालय आईआईटी के सहयोग से इंक्यूबेशन के क्षेत्र में बड़ी पहल कर रहा है। यहां के सेंटर में न सिर्फ छात्रों बल्कि किसी भी अशिक्षित व्यक्ति को नए विचार के साथ शोध पर काम करने का मौका होगा। इसके लिए बाकायदा पैसा दिए जाने का प्रावधान है।

विकसित किये जा रहे हैं ड्रोन के अत्याधुनिक प्रणाली

ड्रोन को लेकर दुनियाभर में रोजाना नए अविष्कार हो रहे हैं। लेकिन आईआईटी दिल्ली के फिजिक्स इंजीनियरिंग के छात्रों ने ऐसा छोटा ड्रोन तैयार किया है जो चार हजार फीट तक उड़ान भर सकता है। ऐसा दावा करते हुए फिजिक्स इंजीनियरिंग विभाग ने बताया कि यह तस्वीरें लेने के साथ-साथ दुश्मनों पर हमला भी कर सकता है। इसमें अत्याधुनिक लेंस, सेंसर हैं। खास बात यह है कि इसमें छोटी बंदूकों को इंस्टॉल किया जा सकता है। बंदूक को सेंसर से जोड़ा जा सकता है। सेंसर और रिमोर्ट से ये किसी पर भी हमला कर सकता है। यह दाएं, बाएं व ऊपर-नीचे पूरा घूम सकता है ताकि हर तरह की तस्वीरें ली जा सकें।

गार्डन की सफाई के लिए ‘मैकेनिकल स्वीपर’

दिखने में तो लकड़ी से तैयार की गई साधारण सी चीज लगती है लेकिन जब इसे एक खास चिप के जरिए बिजली से चलाया जाता है तो इसकी खासियत का पता चलता है। मैकेनिकल स्वीपर नामक मशीन गार्डन व पार्क की सफाई के लिए बनाई गई है। इसे चिप से चलाया जाता है। चिप को रिमोट से कंट्रोल किया जाता है। खास बात यह है कि इसकी चिप सफाई के दौरान यह भी बता देती है कि  कितनी फीसदी सफाई हो चुकी है और कितनी रहती है। जानकारी स्क्रीन में आती है।

इंजन में बिना बदलाव के बायोगैस से चलाएं कार

आईआईटी संस्थान के छात्रों ने बायोगैस से चलने वाली तकनीक तैयार की है। इसके प्रयोग से सीएनजी किट वाली कार को बायोगैस से चलाया जा सकता है। इंजन में बदलाव की जरूरत नहीं पड़ेगी। रिसर्च एंड डेवलपेंट विभाग के डीन प्रो. सुनीत तुली ने बताया कि तकनीक बेहद सस्ती है। एक किलोग्राम सीएनजी जहां 50 रुपये से अधिक है तो वहीं एक किलोग्राम बायोगैस का इस्तेमाल करने में अधिकतम 35 रुपये का खर्चा आएगा। उन्होंने बताया कि संस्थान ने इसके लिए पंप भी तैयार किए हैं। प्रदूषण नहीं होगा। गैस को गोबर व कचरों से तैयार किया जा सकता है। खास बात यह है कि आईआईटी अब बायोगैस कार व इस तकनीक की मार्केटिंग भी करने जा रहा है।

इंटरनेशनल कांफ्रेंस में जाने के लिए छात्रों को फंड

शोध के लिए इंटरनेशनल कांफ्रेंस में जाने के लिए आईआईटी सहायता देगा। छात्रों को बीस हजार रुपये की न्यूनतम सहायता दी जाएगी और शेष पैसे का इंतजाम छात्रों को करना होगा लेकिन किसी कारणवश शेष पैसे का इंतजाम नहीं कर पाता तो आईआईटी उन्हें 80,000 रुपये की सहायता और देगी। लेकिन ये अस्सी हजार रुपये प्राप्त करने के लिए उन्हें कम से कम दो जगह आवेदन करना जरूरी है।

बहुउद्देशीय प्रयोगशाला

आईआईटी में एक मल्टीपरपज प्रयोगशाला तैयार होगी। इस प्रयोगशाला में आईआईटी के बाहर के शोधकर्ता भी प्रयोग कर सकेंगे। इसमें हर तरह के प्रायोगिक उपकरण मौजूद होंगे। इस प्रयोगशाला का प्रयोग बाहर के लोगों के लिए भी होगा। प्रयोगशाला को सेंट्रल रिसर्च फैसलिटी नाम दिया गया है। इसमें कई इंटरडिसिप्लनरी विषयों के साथ-साथ इंवायरनमेंट साइंस, बायोलॉजिकल साइंस, एटमॉस्फिरक साइंस आदि के नवीनतम उपकरण उपलब्ध होंगे। ज्ञात हो कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी ऐसी ही एक प्रयोगशाला एआईआरएफ (एडवांस इंस्ट्रुमेंटेशन रिसर्च फैसलिटी) नाम से बनी हुई है।

आईआईटी व आईआईएम के सहयोग से कोई भी कर सकता है शोध

अंबेडकर विश्वविद्यालय आईआईएम व आईआईटी की मदद से इंक्यूबेशन सेंटर खोलेगा। छात्र हो या कोई भी, सभी को बिजनेस आइडिया होने पर बिजनेस शुरू कराया जाएगा। बाकायदा निवेश के लिए पैसे दिए जाएंगे। किसी भी उम्र का शिक्षित व अशिक्षित व्यक्ति बेहतर और अनोखा आइडिया होने पर कारोबार शुरू करने के लिए आवेदन कर सकेगा। कारोबार किसी भी क्षेत्र से जुड़ा छोटा या बड़ा हो सकता है।

विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ बिजनेस पब्लिक पोलिसी के निदेशक कुरियाकोस मामकोट्टम ने बताया कि इसकी शुरुआत करने का मकसद प्रतिभा को तलाशना है। इस योजना को अब तक शुरू होना था लेकिन तकनीकी कारणों से देरी हुई। अगले कुछ माह में सेंटर खुल जाएगा। स्कूल ऑफ डिजाइन के डीन प्रो. जतिन भट्ट ने बताया कि सबसे पहले आवेदन करना होगा। फिर उस पर कमेटी अमल करेगी। उनके आइडिए और कारोबार का मकसद जानने के लिए स्क्रीनिंग कराई जाएगी। स्क्रीनिंग कई चरणों में होगी। इसमें पता लगाया जाएगा कि कारोबार का मकसद समाज के हित में है या नहीं, निजी हित में कारोबार करने वालों को खारिज किया जाएगा। यही नहीं, प्रो. भट्ट ने कहा कि समाजसेवा के नाम पर एनजीओ नहीं खोले जाएंगे।

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