Published On: Tue, Nov 11th, 2014

49वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हुए प्रख़्यात कवि केदारनाथ सिंह

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नई दिल्ली। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने प्रख़्यात हिंदी कवि केदारनाथ सिंह को भारतीय साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया है। राष्ट्रपति ने कहा कि केदारनाथ सिंह ने अपनी कविताओं के माध्यम से हमें अनुप्रास एवं काव्यात्मक गीत की दुर्लभ संगति दी है और उन्होंने वास्तविकता एवं गल्प को समानता के साथ समाहित किया है। उनकी कविताओं से अर्थ, रंग एवं स्वीकार्यता झलकती है। मुखर्जी ने कहा, ‘अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी कवि न केवल आधुनिक कला सौंदर्य के प्रति संवेदनशील हैं बल्कि पारंपरिक ग्रामीण समुदायों के प्रति भी उनकी संवेदना झलकती है।

RH- Jananpith Award-Kedarnath Singhहालांकि केदारनाथ सिंह वामपंथ में रुचि रखने वाले एक सम्मानित शिक्षक हैं जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया है। लेकिन केदार की कविताओं की बात ही निराली है। केदार की कविताओं की दुनिया एक ऐसी दुनियाँ है जिसमें रंग, रोशनी, रूप, गंध, दृश्य एक-दूसरे में खो जाते हैं। पर यही दुनियाँ है, जिसमें कविता का कमिटमेंट खो नहीं जाता- वहाँ हमें कविता के मूल सरोकार, कविता की बुनियादी चिन्ता, कविता का कथ्य या संदेश पूरी तीव्रता के साथ ध्वनित या स्पन्दित रहता है।RH-Jananith Award

केदार की कविता किसी अर्थ में एकालाप नहीं, वह हर हालत में एक सार्थक संवाद है। वह एक पूरे समय की व्यवस्था और उसकी क्रूर जड़ता या स्तब्धता को विचलित करती है। चुप्पी और शब्द के रिश्ते को वह बखूबी पहचानती है और उसे एक ऐसी काव्यात्मक चरितार्थता या विश्वसनीयता देती है, जिसके उदाहरण कम मिलते हैं।

RH-Jananpith Eleven lakh Rupeeकेदार की कवितायें वास्तविकता का बयान होकर नहीं रहतीं, वे लगातार वास्तविकता के तल में छिपी हुई किसी उथल-पुथल की ओर इशारा करती हैं। उनके यहाँ खलिहान से उठते हुए दानों की आवाज़ है, जो मण्डी जाने से इंकार करते हैं, मनुष्य के खाली सिर है, जो अपने बोझ का इंतजार कर रहे हैं, रोहू, मछली की डब-डब आँखें हैं, जिसमें जीने की अपार तरलता है और अंततः वह बेचैन धूल है, जो कवि के यक़ीन को अब भी बचाये हुए है- “नमक में, पानी में, पृथ्वी के भविष्य में और दन्त-कथाओं में।”

केदार की कविता उन्हीं के द्वारा रचित ‘बाघ’ की उस चिन्ता की तरह है, जो सूर्यास्त के बाद कही दूर से बस्ती को देखता है और इस बात से परेशान है कि आज वहाँ धुआँ क्यों नहीं उठ रहा! कविता की सुपरिचित दुनियाँ का यह विषाद-भरा धुआँ केदार की कविता में किस तरह जीवन का सूचक बन जाता है, इस कलात्मक-कौशल की पड़ताल दिलचस्त हो सकती है।

RH-President Jananpith Awardकेदार को सम्मानित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि उनकी इच्छा है कि नयी पीढ़ी भारतीय क्लासिक में गहराई तक उतरे। केदार को संसद के पुस्तकालय भवन स्थित बालयोगी प्रेक्षागृह में 49वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा, “इससे न केवल नैतिक मानदंडों को ठीक करने में मदद मिलेगी बल्कि राष्ट्र निर्माण में हमारे प्रयासों में शानदार योगदान रहेगा।” ज्ञानपीठ पुरस्कार की स्थापना समाजसेवी दंपति साहू शांति प्रसाद जैन और दिवंगत रमा जैन ने की थी। भारतीय साहित्य में भारतीय लेखकों के योगदान के महत्व को देखते हुए यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है।

केदार की बहुचर्चित कविता ‘बाघ’ की कुछ पंक्तिः

सुबह के अखबार में
एक छोटी-सी ख़बर है
कि पिछली रात शहर में
आया था बाघ!

किसी ने उसे देखा नहीं
सुनी नहीं किसी ने अँधेरे में
उसके चलने की आवाज़
गिरी नहीं थी किसी भी सड़क पर
खून की एक भी बूँद

पर सबको विश्वास है
कि सुबह के अखबार में छपी हुई ख़बर
ग़लत नहीं हो सकती
कि जरूर-जरूर पिछली रात शहर में
आया था बाघ

सच्चाई यह है कि हम शक नहीं कर सकते
बाघ के आने पर
मौसम जैसा है
और हवा जैसी बह रही है
उसमें कभी भी और कहीं भी आ सकता है बाघ

पर सवाल यह है
कि आख़िर इतने दिनों बाद
इतने बड़े शहर में
क्यों आया था बाघ?

क्या वहा भूखा था?
बीमार था?
क्या शहर के बारे में
बदल गये हैं उसके विचार?

यह कितना अजीब है
कि वह आया
उसने पूरे शहर को
एक गहरे तिरस्कार
और घृणा से देखा
और जो चीज जहाँ थी
उसे वहीं पर छोड़कर
चुप और विरक्त
चला गया बाहर!

Published on: Nov 11, 2014 @ 4:37/www.republichind.com
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