Published On: Sat, Jan 24th, 2015

सेक्सुलर भारत के लिए जरूरी है ‘समान नागरिक कानून’

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नई दिल्ली। ‘समान नागरिकता कानून’ के नाम से देश के कई राजनीतिक पार्टियाँ और समाजिक संगठन हंगामा शुरू कर देते हैं, और इस कानून को भारतीय जनता पार्टी की भगवा कानून की उपाधि देने में तनिक भी देरी नहीं करते। लेकिन विश्व का कोई भी देश, जहां भारत जैसे विभिन्नता भरे समाज हैं, यकीनन वहाँ की संविधान निर्माताओं ने अपने राष्ट्रहित में समान नागरिकता कानून बनाई है।

RH-Common Civil Codeसमान नागरिकता कानून का अर्थ भारत के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून से है। समान नागरिक संहिता एक धर्मनिर्पेक्ष कानून होता है जो सभी धर्मों के लोगों के लिए समान रूप से लागू होता है। अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग सिविल कानून न होना ही ‘समान नागरिक संहिता’ का मूल भावना है। समान नागरिक कानून से अभिप्राय कानूनों के वैसे समूह से है जो देश के समस्त नागरिकों (चाहे वह किसी धर्म या क्षेत्र से संबंधित हों) पर लागू होता है। यह किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है।

ऐसे कानून विश्व के अधिकतर आधुनिक देशों में लागू हैं। समान नागरिकता कानून के अंतर्गत व्यक्तिगत स्तर, संपत्ति के अधिग्रहण और संचालन का अधिकार विवाह, तलाक और गोद लेना आता है।

समान नागरिकता कानून भारत के संबंध में है, जहां भारत का संविधान राज्य के नीति निर्देशक तत्व में सभी नागरिकों को समान नागरिकता कानून सुनिश्चित करने के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। हालांकि इस तरह का कानून भारत में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के खिलाफत के कारण अभी तक लागू नहीं किया जा सका है।

भारत में अधिकतर निजी कानून धर्म के आधार पर तय किए गए हैं। हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध हिंदू विधि के अंतर्गत आते हैं, जबकि मुस्लिम और ईसाई के लिए अपने कानून हैं। मुस्लिमों का कानून शरीअत पर आधारित है। अन्य धार्मिक समुदायों के कानून भारतीय संसद के संविधान पर आधारित हैं।

1993 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए बने कानून में औपनिवेशिक काल के कानूनों में संशोधन किया गया। इस कानून के कारण धर्मनिरपेक्ष और मुसलमानों के बीच खाई और गहरी हो गई। वहीं, कुछ मुसलमानों ने बदलाव का विरोध किया और दावा किया कि इससे देश में मुस्लिम संस्कृति ध्वस्त हो जाएगी।

यह विवाद ब्रिटिशकाल से ही चला आ रहा है। अंग्रेज मुस्लिम समुदाय के निजी कानूनों में बदलाव कर उससे दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहते थे। हालांकि विभिन्न महिला आंदोलन के कारण मुसलमानों के निजी कानूनों में थोड़ा बदलाव हुआ। प्रक्रिया की शुरुआत 1772 के हैस्टिंग्स योजना से हुई और अंत शरिअत कानून के लागू होने से हुई। हालांकि समान नागरिकता कानून उस वक्त कमजोर पड़ने लगा, जब तथाकथित सेक्यूलरों ने मुस्लिम तलाक और विवाह कानून को लागू कर दिया।

1929 में, जमियत-अल-उलेमा ने बाल विवाह रोकने के खिलाफ मुसलमानों को अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने की अपील की। इस बड़े अवज्ञा आंदोलन का अंत उस समझौते के बाद हुआ जिसके तहत मुस्लिम जजों को मुस्लिम शादियों को तोड़ने की अनुमति दी गई।

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Displaying 1 Comments
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  1. Nitish says:

    Sir,
    i m also in favour of this uniform civil law. We should take it to beyond this rubbish constitution.

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