Published On: Fri, May 8th, 2015

जानिए…पत्नि क्यों रखती हैं ‘वट सावित्री व्रत’

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17 मई, रविवार को आमवस्या है, इस दिन भारतीय नारी वट सावित्री व्रत रखती है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक है। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है। वट सावित्री व्रत सौभाग्य को देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया है।

RH-Vat Savitri vratव्रत सावित्री का उद्देश्य सौभाग्य की वृद्धि और पतिव्रत के संस्कारों को आत्मसात करना होता है। कई व्रत विशेषज्ञ यह व्रत ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिनों तक करने में भरोसा रखते हैं। इसी तरह शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से पूर्णिमा तक भी यह व्रत किया जाता है। विष्णु उपासक इस व्रत को पूर्णिमा को करना ज्यादा हितकर मानते हैं।

वट सावित्री व्रत में ‘वट’ और ‘सावित्री’ दोनों का विशिष्ट महत्व माना गया है। पीपल की तरह वट या बरगद के पेड़ का भी विशेष महत्व है। पाराशर मुनि के अनुसार- ‘वट मूले तोपवासा’ ऐसा कहा गया है। पुराणों में यह स्पष्ट किया गया है कि वट में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती है। वट वृक्ष अपनी विशालता के लिए भी प्रसिद्ध है।

वट वृक्ष का पूजन और सावित्री-सत्यवान की कथा का स्मरण करने के विधान के कारण ही यह व्रत वट सावित्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सावित्री भारतीय संस्कृति में ऐतिहासिक चरित्र माना जाता है। सावित्री का अर्थ वेद माता गायत्री और सरस्वती भी होता है। सावित्री का जन्म भी विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था। कहते हैं कि भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी।

उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्रीदेवी ने प्रकट होकर वर दिया कि ‘राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी।’ सावित्रीदेवी की कृपा से जन्म लेने की वजह से कन्या का नाम सावित्री रखा गया।

कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान थी। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा। सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया।

RH-Vat Savitriबताया जाता है कि साल्व देश पूर्वी राजस्थान या अलवर अंचल के इर्द-गिर्द था। सत्यवान अल्पायु थे। वे वेद ज्ञाता थे। नारद मुनि ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी थी, परंतु सावित्री ने सत्यवान से ही विवाह रचाया। पति की मृत्यु की तिथि में जब कुछ ही दिन शेष रह गए तब सावित्री ने घोर तपस्या की थी, जिसका फल उन्हें बाद में मिला था। सावित्री के दृढ़ संकल्प के सामने यमराज ने विवश होकर उनके पति सत्यवान को फिर से जीवित कर दिया था, इसीलिए इस दिन महिलाएं अपने अखंड और अटल सुहाग के लिए वट-वृक्ष का पूजन करती हैं।

ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक वट सावित्री व्रत दक्षिण और उत्तर भारत में अलग-अलग तरीके से रखे जाते हैं। अमावस्या के दिन सत्यवान, सावित्री और यमराज की भी पूजा की जाती है। वट सावित्री व्रत को बड़ सायत पूजा भी कहते हैं। इस दिन से रोज वट वृक्ष में पानी, मौली, रोली, चावल, गुड़, भीगा हुए चने, फूल और सूत मिलाकर बड़ के पेड़ पर लपेटते हैं और परिक्रमा करते हैं।

यह व्रत सुहागिनें ही रख सकती हैं, ताकि उनके पति का स्वास्थ्य, आयु और सौभाग्य सुख अक्षय रहे। सावित्री ने वट-वृक्ष की पूजा करके अपने मृतक पति को यमराज के आशीर्वाद से पुन: प्राप्त कर लिया था। व्रत में बड़ के पत्ते, मिट्टी का घड़ा और सावित्री, सत्यवान और भैंस पर सवार यमराज की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर धूप चंदन, दीपक से पूजन किया जाता है। सत्यवान-सावित्री की कथा भी सुनी जाती है और स्त्रियां अखंड सौभाग्यवती रहने की मंगलकामना से करती हैं।

वट सावित्री व्रत की विधिः

  • प्रातःकाल घर की सफाई कर नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें।
  • तत्पश्चात गंगा जल का पूरे घर में छिड़काव करें।
  • इसके बाद बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना करें।
  • ब्रह्मा के वाम पार्श्व में सावित्री की मूर्ति स्थापित करें।
  • इसी प्रकार दूसरी टोकरी में सत्यवान तथा सावित्री की मूर्तियों की स्थापना करें। इन टोकरियों को वट वृक्ष के नीचे ले जाकर रखें।
  • इसके बाद ब्रह्मा तथा सावित्री का पूजन करें।

अब निम्न श्लोक से सावित्री को अर्घ्य देंः

अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान्‌ पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥

तत्पश्चात सावित्री तथा सत्यवान की पूजा करके बरगद की जड़ में पानी दें।

और इस मंत्र का जाप करेंः

यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले।
तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मा सदा॥

  • पूजा में जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप का प्रयोग करें।
  • जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करें।
  • बरगद के पत्तों के गहने पहनकर वट सावित्री की कथा सुनें।
  • भीगे हुए चनों का बायना निकालकर, नकद रुपए रखकर सासुजी के चरण-स्पर्श करें।
  • यदि सास वहां न हो तो बायना बनाकर उन तक पहुंचाएं।
  • वट तथा सावित्री की पूजा के पश्चात प्रतिदिन पान, सिन्दूर तथा कुंमकुंम से सौभाग्यवती स्त्री के पूजन का भी विधान है। यही सौभाग्य पिटारी के नाम से जानी जाती है। सौभाग्यवती स्त्रियों का भी पूजन होता है। कुछ महिलाएं केवल अमावस्या को एक दिन का ही व्रत रखती हैं।
  • पूजा समाप्ति पर ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करें।

अंत में निम्न मंत्र का संकल्प लेकर उपवास रखेंः

मम वैधव्यादिसकलदोषपरिहारार्थं ब्रह्मसावित्रीप्रीत्यर्थं
सत्यवत्सावित्रीप्रीत्यर्थं च वटसावित्रीव्रतमहं करिष्ये।

इस व्रत में सावित्री-सत्यवान की पुण्य कथा का श्रवण करें अथवा औरों को सुनाएं।

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