Published On: Fri, Jun 19th, 2015

‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के महत्व पर स्वामी देवव्रत सरस्वती से विशेष बातचीत

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‘योग’ शब्द संस्कृत की युज धातु से बना है, जिसका अर्थ समाधि और मिलाना है। महर्षि व्यास ने भी योग को समाधि का वाचक माना है, जिसमें मन को भलीभांति समाहित किया जाए उसे समाधि और आत्मा-परमात्मा के मेल को योग कहते हैं। महर्षि चरक ने मन का इन्द्रिय एवं विषयों से पृथक होकर आत्मा में स्थिर होना ही योग बतलाया है।

यर्जुर्वेद में कहा गया है कि जो मनीषी लोग हैं, जो योगी लोग हैं, जो ध्यान वाले योगी जन हैं, वो अपने मन को और अपने बुद्धियों को परमात्मा में युक्त करते हैं। अथर्ववेद में तो स्पष्ट आया है, आठ चक्रों वाले और नौ द्वारों वाले यह देवों की नगरी है। इस देवों की नगरी में एक बहुत ही प्रकाशित कोश है। जहाँ पर आत्मा और परमात्मा का निवास है।

योग की दो शाखाएं वैदिक काल से चली आ रही है, सांख्य योग और क्रिया योग। क्रिया योग के सबसे पहले आचार्य हिरण्यगर्भ को मानते हैं, और सांख्य योग के पहले आचार्य महर्षि कपिल को मानते हैं। आगे जाकर योग के चार विभाग हो गये। मंत्र योग, लययोग, हठ योग और राज योग।

मंत्र के द्वारा चितवृति निरोध करना, नाम के द्वारा नामी को प्राप्त करने का नाम है मंत्र योग। मंत्रयोग में परम पवित्र गायत्री मंत्र या प्रणव(ओउम) का जप अथवा किसी अभीष्ट मंत्र का जप किया जाता है। यदि मंत्र के साथ-साथ श्वास-प्रश्वास की तालबद्धता और अर्थचिन्तन भी किये जाएं तो मन को एकाग्र करने में बहुत सहायता मिलती है।

लययोग में अनेक विधियाँ हैं, जिसके द्वारा चितवृति को विलीन करके परमात्मा में समाहित करना होता है। लययोग की स्थिति आने पर प्राण-संचार स्थिर या निरुद्ध होकर केवल कुम्भक की अवस्था आ जाती है।

हठयोग को प्राणयोग या कुण्डलिनीयोग भी कहते हैं। हठयोग में हकार सूर्य स्वर, पिंगलानाड़ी और ठ चन्द्र स्वर, इडा नाड़ी का वाचक है। ये दोनों नाड़ियां सुषुम्णा के दाहिने बायें सहस्त्रारचक्र से मूलाधारक तक गई हुई हैं। प्रत्येक चक्र पर ये परस्पर काटती हुई आगे बढ़ती हैं। सामान्य अवस्था में प्राण इन दोनों नाड़ियों से प्रवाहित होती है। कभी दाहिने स्वर और कभी बांये स्वर से चलता है। इन दोनों नाड़ियों के प्राण को मिलाकर उसे सुषुम्णा में प्रवाहित करना अर्थात हकार और ठकार को मिलाना ही हठयोग है।

हठयोग का उद्देश्य केवल राजयोग(समाधि) प्राप्त करना है। बगैर हठयोग के राजयोग सिद्ध नहीं होता और बिना राजयोग के हठयोग निष्फल है, अतः इन दोनों को एकसाथ ही अभ्यास करना चाहिए।

महर्षि पतंजली का योग जिसे राजयोग कहते हैं। जिसे चितवृति निरोध किया जाता है। समाहित चित्त वालों के लिए अभ्यास और वैराग्य तथा विक्षिप्त चित्त के लिए तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधानात्मक क्रियायोग तथा अष्टांगयोग के साधनों का विधान किया है। इनका अनुष्ठान करने से अविद्यादि क्लेशों की निवृति, अशुद्धि का नाश और ज्ञान का प्रकाश होकर विवेकज्ञान की प्राप्ति होती है।

ऋषिगण बताते हैं कि मंत्रयोग, लययोग, हठयोग, भक्तियोग और अन्य जितने भी योग के प्रकार हैं, वो सारे राजयोग के अंदर ही समाप्त होते हैं। राजयोग मुख्य है। राजयोग समाधि का वाचक है। समाधि योग का अंतिम सोपान है। राजयोग के अंतर्गत महर्षि पतंजलि का अष्टांगयोग आता है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, ‘समत्वं योग उच्यते’ और ‘ योगः कर्मसु कौशलम्’ कर्मों को इन प्रकार से करना, जैसे कि कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी जल से अलिप्त होता है, उसीतरह निष्काम भाव से कर्म करना ही योग है। योगीराज श्रीकृ्ष्ण बताते हैं कि योग से आत्मा की अपने स्वरूप में स्थिति, ज्ञान का उदय और कर्म का क्षय होकर परमात्मा का साक्षात्कार होता है। योगाभ्यास से शरीर में हलकापन, नीरोगता, मन की स्थिरता, शरीर में ओज की वृद्धि, सुगन्ध एवं रोग-शोक से छुटकारा होता है। अविद्या का नाश होकर ऋतंभरा प्रज्ञा की प्राप्ति होती है। यह प्रज्ञा वस्तु के यर्थात स्वरूप का ज्ञान कराने में समर्थ होती है।

योग के महत्व

‘योग’ से आत्मदर्शन कर लेना परम धर्म(कर्त्तव्य) है। ‘योगी’ तपस्वी, ज्ञानी और कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है।

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