Published On: Tue, Mar 1st, 2016

शिक्षा, सिनेमा और सनतान समाज

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सचित्र मनोरंजन और मौखिक जानकारी हमेशा से ही भारतीय समाज में लोक शिक्षा के मजबूत स्तम्भ रहे हैं। सभ्यता के आधुनिक रूप तक पहुँचते हुए भारतीय सनातन समाज ने बहुत ही लम्बी यात्रा की है। इस यात्रा से प्राप्त अनुभूतियों के आधार पर भारतीय समाज ने शिक्षा के क्षेत्र में अनेक आयाम विकसित किए। अपने आदि काल से ही संगीत व श्रवण इत्यादि अनेकों माध्यमों से शिक्षक समाज में शिक्षा का प्रसार करते रहे हैं।

RH- Cinema Ashwaniजब-जब साक्षर शिक्षा में गतिरोध उत्त्पन्न हुआ, लोक कलाओं के माध्यम से लोगों को सामूहिक रूप में विद्वानों ने शिक्षित करने का कार्य किया है। इस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था से अनेकों ऐतिहासिक लोकगाथाओं-कथाओं का जन्म हुआ, कई ग्रंथों की रचना हुई, रागों-तरंगों का सृजन व मंचन हुआ। अपने किसी भी कष्ट काल में भारतीय समाज ने शिक्षित बने रहने की अपनी प्रकृति का त्याग नहीं किया।
 
इसी के फलस्वरूप सनातन समाज का सम्पूर्ण विघटन होने की बजाय उसकी अनेकों शाखाएं फूट कर सर्वत्र फैल गईं। अनेकों समूहों ने विविध प्रकार की कला पद्धतियों से अपने समूह-जनों में जानकारी का प्रसारण किया। यदि हम कथाश्रवण, रामलीला, दुर्गा पूजा, गणेश पूजा जैसे उत्सवों और उनकी मंचन शैली का विश्लेषण करें तो हमें ज्ञात होता है कि इनके मूल में सिर्फ़ मनोरंजन व धार्मिक मान्यताएं ही नहीं हैं।| इन जनसंपर्क मंचनों में निहित शिक्षा को हमेशा सांकेतिक ही रक्खा गया। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि जानकारियों का कलात्मक घोल बनाकर उसको सांस्कृतिक व धार्मिक रूप में लोगों को परोसने की हमारे सनातन व्यवस्था ने स्थापित किया।
 
अपनी इसी सामाजिक रचनात्मकता के कारण जब 7 जुलाई 1886 को भारतीयों का चलचित्र माध्यम से परिचय हुआ तो जल्द ही उन्होंने उसे अपना लिया। श्री भटवडेकर ने 1899 में पहला लघु चलचित्र “पहलवान” बनाया। 1913 में भारत में पहली बड़ी फिल्म “राजा हरिश्चंद्र” प्रदर्शित हुई, लोगों ने इसको खूब सराहा। इस प्रकार भारतीय समाज में शिक्षा प्रसारण का एक नया माध्यम प्रकट हो गया। भारतीय जनमानस ने सिनेमा घरों को मंदिरों की तरह लिया।
 
युवा पीढ़ी के लोग इसकी तरफ विशेष रूप से आकर्षित हुए। उस काल के फिल्मकारों ने भी इसको समझा, सिनेमा घरों ने देश के नौजवानों को एक ऐसा स्थान प्रदान किया जहाँ आकर वे सामाजिक व राजनीतिक कुंठाओं से दूर अपना कुछ समय बिता सकें। भारतीय सिनेमा का प्रारंभिक दौर दो भागों में था एक तरफ़ थीं जानकारी से भरी हुई लघु डॉक्यूमेंटरीज़ और दूसरी तरफ थीं जानकारी और मनोरंजन से भरपूर धार्मिक फिल्में।
 
धीरे-धीरे सिनेमाघरों पर विचारकों और साहित्यकारों की नज़र पड़ने लगी और सिनेमा के ज़रिये समाज में नये-नये प्रयोग होने लगे। भारतीय सिनेमा में सामाजिक, धार्मिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक फिल्मों के साथ-साथ मनोरंजन से भरपूर मसाला फिल्मों की कतार लगने लगी। सिनेमा ने समाज में राष्ट्रियता की भावना को फ़ैलाने का भी कार्य किया। स्वतंत्रता के पश्चात् सिनेमा का और अधिक विस्तार हुआ। अनेक नौजवान फिल्मकारों ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया और सामजिक विषयों पर कई बेहतरीन फिल्में भारतीय समाज को दीं।
 
इन्हीं फिल्मों ने समाज में समाजवादी व वामपंथी विचारधारा के लिए ज़मीन तैयार किया। इसके कारण कई नये राजनीतिक दलों का जन्म हुआ। इलाकाई और भाषाई पहचानों को समाज में बरकार रखने में भी सिनेमा ने बहुत बड़ा योगदान दिया है। जहाँ हिंदी सिनेमा ने पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया, वहीँ क्षेत्रीय भाषाओं ख़ासतौर से दक्षिण भारतीय भाषाओँ में बनी फिल्मों ने उत्तर और दक्षिण को मिलाने का काम भी किया। फिल्मों का भारतीय समाज पर इस कदर प्रभाव पड़ा कि कई बड़े राजनेताओं ने भी इसी रास्ते से अपनी पहचान बनाई है।
 
इतना ही नहीं, आधुनिक भारतीय सिनेमा कला ने अपने 100 साल के इतिहास में, समाज में उठे अनेक जनआंदोलनों को वैचारिक तौर पर सहयोग दिया है। भारतीय समाज के सांस्कृतिक ढांचे के कारण सिनेमा यहाँ केवल मनोरंजन का साधन न होकर शिक्षा का भी एक माध्यम है। किन्तु न जाने क्यों नीति निर्धारक अभी तक इस सत्य के प्रति उदासीन हैं।
 
भारतीय समाज की उन्नति और श्रेष्ठता को बनाये रखने के लिए इस ओर ध्यान देने की बहुत आवश्यकता है।| आज सिनेमा जगत में तकनीक के अनेक रूपों का विकास हो चुका है। सिनेमा घरों से सिनेमा अब लोगों के घरों और उनकी जेब तक पहुँच गया है। यह रोजगार का भी एक बहुत बड़ा साधन है। जल्द ही शिक्षा के पारंपरिक क्षेत्र में इसका बहुत विस्फोटक प्रसार होने वाला है। इसके लिए समाज में तकनीकी रूप से प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता है। भारत में ऐसे संस्थानों का भारी कमी है जो भारतीय संस्कृति से पोषित फिल्मकार फिल्म जगत को दे सकें।
 
जो भी नए फिल्मकार इस क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं, वे न तो भारतीय सांस्कृतिक विचारधारा से पोषित हैं और न ही समाज की अब तक अक्षुण रही संस्कृतिक धरोहरों के प्रति आस्था रखते हैं। वे पश्चिमी सभ्यता और दर्शन मूल्यों से प्रभावित हैं। विशुद्ध लाभ प्राप्त करना ही उनका एकमात्र उद्देश्य है। क्योंकि इन फिल्मकारों में भारतीय परम्पराओं के प्रति कोई आस्था नहीं है, वहीं व्यवसायिक कारणों से वे पश्चिम के दर्शन को यहाँ पूरी तरह लागू भी नहीं कर सकते हैं। अतः ये फिल्मकार भारतीय सामाजिक उत्सवों का व्यवसायिक दोहन करते हुए परम्पराओं का भरपूर मज़ाक उड़ाते हैं। फलतः भारतीय समाज का सांस्कृतिक और वैचारिक पतन बहुत तेजी से हो रहा है।
 
सामाजिक शिक्षा के इस मजबूत माध्यम की अनदेखी यदि इसी तरह लगातार होता रहा तो राजनेताओं और विचारकों के भारत को विश्व गुरु बनने के सपने कभी हकीकत नहीं बन पाएंगे।
प्रख्यात फिल्मकार
 
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