Published On: Sun, Apr 22nd, 2018

कुरुवंशियों ने स्थापित किया था ‘मक्केश्वर’ शिव का मंदिर, जो काबा कहलाया

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हिडन हिस्ट्री। अरबस्थान की मरुभूमि में एक सम्प्रदाय का उदय हुआ जो मतांधता का प्रबल झंझावात बनकर देखते-देखते पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और यूरोप में इस प्रकार छा गया कि किसी ने उसकी कल्पना भी नहीं की थी। मिस्त्र, रोम, एवं पारस की प्रदीर्घ गौरवशाली परम्पराएँ इस शैतानी तूफान की चपेट में आ गईं। कभी ये वैभवशाली सभ्यताएँ विश्व की महासत्ताएँ थीं। संस्कृति के साथ ही उनकी प्रशासनिक एवं लश्करी संगठन की परम्पराएँ भी अद्वितीय थीं। परंतु इस नए संप्रदाय के प्रवर्तक हज़रत मोहम्मद की, जो ईश्वर के प्रेषित पैगंबर कहलाए, मृत्यु के पश्चात केवल तीस वर्ष के अंदर ही ये महासत्ताएँ अपनी सभ्यताओं एवं परम्पराओं सहित धराशायी हो गईं। मध्य एशिया व पारस को जीतते ही यह आक्रमणकारी झंझावात भारत के प्रवेश पर आ धमका।

भारत के पश्चिम में अरबस्थान तथा अरबस्थान के उत्तर व उत्तर पूर्व में क्रमशः सीरिया और इराक व उत्तर पश्चिम में तुर्किस्तान है। अरबस्थान के लोग अरब या अरबी कहलाते हैं। छठी शताब्दी में अनेक छोटे-बड़े अरबी कबीले इस धरती पर थें। वे भेड़-बकरियाँ पालते थे। चीन और रोम के बीच जो व्यापार चलता था, उसका मार्ग अरबस्थान से होकर जाता था। ऊँट पर सामान लादकर अरब व्यापारी सीरिया जाते, मिस्त्र जाते, मध्य एशिया जाते थे। शासन नाम की कोई चीज वहाँ नहीं थी। अरबस्थान के भयानक रेगिस्तान में बीच-बीच में जल से भरे तालाब और उसके आसपास हरियाली रहती है। उन्हें मरुद्यान कहते हैं। उन दिनों इन मरुद्यानों पर कब्जा करन के लिए यायावर कबीलों में आपसी टकराहटें भी हुआ करती थीं। ऐसी टकराहटों में मारपीट, हत्याएँ व लूटपाट का बोलबाला रहता था। हर कबीले में सर्वशक्तिमान व्यक्ति उस कबीले का प्रमुख बन जाता था और उसके निर्देशन में कबीले के अन्य सदस्य चला करते थे।

‘एक के लिए सब और सबके लिए एक’ यह हर कबीले का नियम रहता था। यदि एक कबीले के किसी सदस्य के साथ किसी अन्य कबीले के सदस्य या सदस्यों द्वारा अनुचित व्यवहार किया जाता था तो पूरा का पूरा कबीला उस अन्य कबीले का दुश्मन बन जाता था और उसके खून का प्यासा हो जाता था। कबीलों में आपसी दोस्ती व सगाई आदि भी होती रहती थीं। स्त्री केवल भोग्य माना जाता था और पत्नियों की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं था।

प्रत्येक कबीले के अपने-अपने देवी-देवता हुआ करते थे। किन्तु सभी कबीलों की श्रद्धा का एक केन्द्र बिन्दु था मक्का का मंदिर जिसमें बीच में एक विशाल ऊँचे चबूतरे के एक कोने में ‘संगे अस्वद’ लगा हुआ था जो किसी उल्का का अंश होने के कारण उसे ईश्वर से प्राप्त निशानी माना जाता था। बीच के चबुतरे के चारों ओर गोलाकार वृत में 360 मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थीं जिसमें प्रति दिन एक-एक मूर्ति की पूजा हुआ करती थी। कुरेशी जाति जिसमें हजरत मुहम्मद पैदा हुए का उपास्य देवता ‘हुबल’ था। प्रतिवर्ष चार महीने ऐसे होते थे जिन्हें पवित्र माना जाता था और उस अवधि में आपसी संघर्ष बंद हो जाया करते थे और सभी कबीले मक्का में लगने वाले ‘उव्दाज’ नामक मेले में सम्मिलित होने के लिए जाया करते थे। काबा के दर्शन करने तथा संगे अस्वद को चूमकर अपनी यात्रा को सफल माना करते थे।

ग्रीक इतिहासकारों ने तो ईसाईपूर्व छष्ठी सदी से काबा अस्तित्व माना है, किन्तु भारतीय इतिहासकारों द्वारा की गई खोजों के अनुसार काबा का अस्तित्व आज से 4 हजार वर्ष पूर्व अथवा ईसा से 2 हजार वर्ष पूर्व निर्धारित किया गया है। कलयुग के प्रारंभ अर्थात आज से करीब 5 हजार पूर्व के 36 वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था। जिसमें अधर्म का उच्चाटन होकर धर्मराज्य की स्थापना हुई थी। बाद में भारत के संस्कृति प्रसारक, ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का उद्घोष करते हुए सम्पूर्ण विश्वभर में फैले। उसी प्रक्रिया में कुरुवंश की एक शाखा अरबस्थान गई और उसने वहाँ ‘मक्केश्वर’ शिव का मंदिर स्थापित किया जो आगे चलकर काबा कहलाया। कुरुवंश के लोग ही मंदिर की पूजा-अर्चना किया करते थे। कुरुवंश शब्द का अप्रभ्रंश ही ‘कुरैश’ शब्द बना जिसमें सन् 570 ईस्वी में हजरत मोहम्मद पैदा हुए।

जन्म के पूर्व ही पिताजी की मृत्यु हो गई थी। अरबस्थान में प्रचलित प्रथा के अनुसार शिशु मोहम्मद को एक बदाऊनी महिला के साथ रखा गया। वहाँ से वापस आने के पूर्व माँ भी चल बसी। उनके चाचा अबूततालिब ने उनका पालन-पोषण किया। चाचा अबूतालिब ऊँट की पीठ पर जीवनाव्श्यक वस्तुओं को लादकर काफिले के साथ बाइजेण्टाइन साम्राज्य जाया करते थे। जवान होने पर नवयुवक मोहम्मद भी उनके साथ जाने लगे। आगे चलकर मक्का की एक धनाढ्य विधवा खदीजा का काफिला लेकर वे जाने लगे। उनकी ईमानदारी, कर्तव्य परायणता एवं सुझबूझ देखकर खदीजा ने उनसे विवाह कर लिया।

इन यात्राओं में एक बात उनके ध्यान में आए बिना न रही कि जब तक वे अरबस्थान में रहते थे तबतक हमेशा एक बात का भय रहता था कि वहाँ कोई कबीला आक्रमण न कर दे। पर जैसी ही बाइजेण्टाइन साम्राज्य में प्रवेश करते थे कि एकदम शांति व सुव्यवस्था की अनुभूति होती थी। धीरे-धीरे उनके मन में यह आकांक्षा जागने लगी कि अपने देश अरब में भी ऐसी शांति और सुव्यवस्था निर्माण होनी चाहिए। यह विचार उन पर हावी होता गया और वे सदा इसी ध्यान में खोए रहने लगे। जिन दिनों काफला नहीं ले जाना होता था। उन दिनों मक्का के आसपास की पहाड़ियों की गुफाओं में घंटो बैठकर इसी पर विचार करते रहते थे। जब रात और दिन कोई प्रश्न मन पर हावी रहता है तो अन्दर से उसके उत्तर भी उभरने लगते हैं। हजरत मोहम्मद के साथ भी यही हुआ। एक दिन उनको आभास हुआ कि एक देवदूत जिब्राइल उनसे कह रहा है, पढ़ो! मोहम्मद ने उत्तर दिया कि मुझे पढ़ना नहीं आता है। पुनः दो-तीन बार यही बात दोहराई गई। हजरत मोहम्मद घबरा गए और घर की ओर चल दिए। उनकी पत्नी खदीजा द्वारा उनसे कारण पूछे जाने पर उन्होंने सारी घटना का वर्णन किया तो पत्नी ने उनसे कहा कि, आप धन्य हैं। अल्लाह ने अपना संदेश देने के लिए आपको अपना पैगम्बर चुन लिया है। तबसे वे बार-बार उन गुफाओं में जाने लगे और संदेश प्राप्त कर उसे जनता में प्रसारित करने लगे। या इलाही इल्लिल्लाह अर्थात जो कुछ है वह अल्लाह है, अल्लाह छोड़कर कुछ नहीं है। इस एकेश्वरवाद का उन्होंने प्रचार करना प्रारंभ कर दिया।

एकेश्वरवाद का प्रचार करते समय स्वाभाविक था कि वे उन अन्य सैंकड़ों देवी-देवताओं की निन्दा करते जिन्हें विभिन्न कबीले पूजा करते थे। इससे उन कबीलो का नाराज होना स्वभाविक था। सर्वप्रथम उन्होंने आबू तालिब से कहा कि वे अपने भतीजे को उन्हें सौंप दें जिसके बदले वे अनेक गुलाम उनकी सेवा में लगा देंगे। किन्तु अबूतालिब इसके लिए तैयार नहीं हुए। तब उन लोगों के मन में हजरत मोहम्मद की हत्या का विचार आया। किन्तु कुरैश कबीला बहुत बड़ा, शक्तिशाली तथा प्रतिष्ठा सम्पन्न था। उसका विरोध मोल लेने का साहस किसी कबीले को नहीं होता था। अंत में उन सबने मिलकर एक योजना बनाई कि 10-15 कबीलों से एक-एक व्यक्ति लेकर उन्हें सम्मिलित रूप से हजरत मोहम्मद की हत्या करने का दायित्व दिया जाए। इन सब कबीलों से रार मोल लेने की हिम्मत कुरैश कबीले की नहीं होगी। किन्तु इस षडयंत्र का पता मोहम्मद को चल गया और वे अपने विश्वस्त साथी एवं अनुयायी अबूबकर के साथ चुपचाप मदीना आ गए। वहाँ के लोगों ने उनका स्वागत किया तथा उनकी सहायता से मोहम्मद ने प्रथम इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की।

जैसे-जैसे उनकी शक्ति बढ़ती गई वैसे-वैसे अनेक कबीले आकर इस्लाम स्वीकार करने लगे। कुछ कबीलों से युद्ध भी करना पड़ा। अंत में जब अधिकांश कबीले इस्लाम के अंतर्गत आ गए, तब हिजरत के आठवें वर्ष में उन्होंने मक्का में प्रवेश किया। मक्का में उनका विरोध करने वाले अधिकांश लोगों को उन्होंने क्षमा कर दिया तथा कुछ की साम-दाम-दंड-भेद से अपने में मिला लिया।

मोहम्मद के मृत्यु के पश्चात सर्वानुमति से निर्वाचित खलीफा अबुबकर का दो वर्षों का कार्यकाल विभिन्न कबीलों के विद्रोहों को दबाने में ही बीत गया। उनके मृत्यु के पश्चात हजरत उमर ने नेतृत्व संभाला और सारे विद्रोहों को दबाकर संपूर्ण सऊदी अरब को एक सूत्र में बाँधा। बाद में यह कहते हुए कि इस्लाम ही अल्लाह का अंतिम संदेश है और उसने उसके पूर्ण के समस्त मजहबों को निरस्त कर दिया है, सारी दुनिया को इस्लाम के दायरे में लाने के उद्देश्य से सीरिया, इराक, तुर्की आदि देशों पर आक्रमण करना प्रारंभ कर दिया। यही से मोहम्मद नहीं अपितु उमर के इस्लाम का विस्तारवादी और क्रूर अध्याय शुरू हुआ।

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